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नया ट्रेंड- गलत तरीके से नाम कमाना

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देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को और संविधान को दूषित करने की नयी परम्परा ने जन्म ले लिया है, इसके द्वारा सहिष्णुता और असहिष्णुता का बीजारोपण करने वाले इसी देश के सम्मानित नागरिको की भीड़ में बैठे जयचंद प्रव्रत्ति के लोग अपने स्वार्थ पूर्ण करने के लिए देश के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने के नित नए प्रयोग करते रहते हैं. आज तकनीकी युग में नित नए समाचारों को पढकर लोगो की स्मृति धूमिल होने लगती है इसलिए कुछ लोगो ने नया ट्रेंड बनाया गलत तरीके से अपने नाम को बार बार जनता के बीच लाना जैसे फिल्मो मे खलनायक का महत्व होता है वैसे ही इनका महत्व कम न हो इस पर ध्यान देना यह उचित समझते हैं. देश में पिछले दिनों एक मुसलमान व्यक्ति की कुछ व्यक्तियों द्वारा हत्या करने की घटना घटित क्या हुई राजनीति के दूषित कीटाणुओं ने अल्पसंख्यक नामक विषाणु को पुरे देश में फ़ैलाने में पूर्ण सहयोग किया, यह उनकी मुस्लिम व्यक्ति अख़लाक़ या उसके परिवार के प्रति संवेदना नहीं थी बल्कि कूटरचित तरीके से केन्द्र की सरकार को असहिष्णुता रूपी गंदगी में गिराने के लिए घिनौना मानसिक मल था, जिसमे सम्मानित पुरस्कार विजेताओ ने भी भ्रमित होकर या साजिश का शिकार होकर अपना सम्मान लौटाया और कल्पना की कि शायद वह भी मशहूर हो जायेंगे कि कभी सरकार को गिराने वाली क्रांति में वह भी गन्दी सोच के साथ खड़े और लड़े थे मुंह छिपाकर. परिणाम सम्मान भी वापस गया और हिस्से में अपमान के अतिरिक्त कुछ नहीं आया शायद यह भविष्य में उन्हें कुछ सबक सिखा सकता, किन्तु असहिष्णुता का पौधा मुरझाने से पहले उसमे नयी खाद यूरिया डालने का प्रयास पुनः राजनीतिक कीटाणुओं द्वारा किया गया और इस बार का विषाणु रोहित वेमुला था,जिसे दलित आधार बनाकर सत्ता की कुर्सी पर बैठने का कुत्सित खेल खेला गया और एक बार फिर सभी विरोधी एक साथ एक ही पत्तल चाटते दिखाई दिए किन्तु सफलता फिर भी नहीं मिली. अब ऐसी घटनाओ से उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ा किन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल हुई, यह गंदे कीटाणु सोचते रहे कि उन्होंने केन्द्र सरकार को दूषित किया किन्तु इसमें उनके अंदर छिपी गंदगी से सम्पूर्ण देश परिचित हो गया. कहते हैं चोर के पाँव नहीं होते ऐसा ही दिखाई पड़ा जब जेएनयू परिसर से कन्हैया नाम का विषाणु पनपा और उसे सींचने के लिए गरीबो के संरक्षक परिवार से जुड़े राहुल गाँधी और ईमानदारी का मफलर लपेटने वाले केजरीवाल जैसे माली पहुँच गए, खूब मचा हंगामा सारे देश में, हलचल से अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में भी सुर्खिया दिखने लगी किन्तु परिणाम फिर भी विरोधियो के लिए तत्काल लाभ देने वाला नहीं रहा,बल्कि इनके पोषण से कन्हैया कुमार को राजनीति की छाया अवश्य मिल गयी जो अच्छी परवरिश मिलने से जल्द ही विषघातक वृक्ष के रूप में अपनी जड़ अवश्य मजबूत कर सकता है. खुजली एक ऐसी बीमारी है जो कभी भी कहीं भी हो सकती है बिना किसी पूर्व चेतावनी दिए, ऐसा ही इन राजनीतिक घटकों के साथ है जब कोई मुद्दा नहीं मिलता तो संसद नहीं चलने देते, देश के जनता की गरीबी और भलाई की बात करने वाले स्वयं देश की जनता के धन से चलने वाली संसद को अकारण अपनी नकाबलियत को छिपाने के लिए हंगामा करके नष्ट करते रहते हैं, इस प्रकर गलत तरीके से नाम कमाकर देश का अपमान करना कितना फलित होता है यह तो भविष्य निर्धारित करेगा किन्तु देश की जनता ऐसे जयचन्दो को चुनाव जिताकर कुछ प्रमाण तो देती ही है इतिहास के संबंध में कि कैसे भारत इतने वर्षों तक बाहरी आतताइयों का गुलाम बनकर रहा.



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