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भारत की संसद का अदृश्य चरित्र

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देश में अराजकता का बढ़ता हुआ दृश्य समाज को शुन्यहीन दिशा प्रदान कर रहा है, इसका असर आम जनता तक ही सीमित नहीं है देश की संसद में भी इसका विस्तार हो रहा है. देश की जनता के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले आयकर से चलने वाली संसद जिसमे देश के हितकारी योजनाओ पर विचार कर देश को समृद्धि की ओर ले जाने का प्रयास किया जाना चाहिए वहा देश की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले ही आपसी द्वेष भावना से ग्रसित होकर संसद को स्थगित करने में गर्व महसूस करते हैं जबकि इससे होने वाली आर्थिक क्षति का श्रोत जनमानस द्वारा दिया गया आयकर है.
संसद में मानसून सत्र दिनाकं २१ जुलाई से १३ अगस्त २०१५ तक चलाया जाना प्रस्तावित है, जिसमे संसद के शुरुवात में ही राज्यसभा और लोक सभा में अनायास हुए हंगामे के चलते संसद को ०४ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया, संसद स्थगित का कारण कोई ऐसा नहीं है जिस पर निर्णय बाद में नहीं हो सकता किन्तु जनता से ज्यादा सांसदों को अपनी गरिमा प्रिय है इसलिए सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिव राज सिंह चौहान के इस्तीफे की मांग को पूरा किया जाना आवश्यक लग रहा है एक दूसरे की टांग खीचने के सिवा संसद में दूसरा कोई मुद्दा देश में रह ही नहीं गया है. संसद को कबड्डी का स्थान बना दिया गया जहा एक पार्टी दूसरे की पार्टी के सदस्य को मौका पाते ही दबोचने का प्रयास करती है, ऐसे खेलो में रूचि रखने वाले देश का संचालन करने का गर्व पा रहे हैं यही जनता का भविष्य है.
संसद में होने वाली कार्यवाही अर्थात एक दिवस में आने वाला व्ययभार एवं जनता का जाने वाला धनराशि का विवरण पर एक नजर आवश्यक है. संसद में एक मिनट की कार्यवाही में 29 हजार रुपए का खर्च, एक घंटे में 17.40 लाख रुपए, एक दिन में 1.91 करोड़ रुपए और यह सत्र १८ दिनों तक चलाया जाना है जिसमे यह आंकड़ा सम्मिलित किये जाने पर आने वाली लागत हो जाती है ३६ करोड़ रुपए, जिसमे ०४ दिन का सत्र स्थगित होने के कारण जनता का ७.६४ करोड़ रुपए अनावश्यक बर्बाद हुए न वह सरकार के हित में हुए और न जनता के किसी काम आया. इसी प्रकार संसद के कार्यों की समीक्षा पर ध्यान देने पर पता चलता है कि 4 दिन में संसद में कितना कार्य किया गया ? एक दिन में लोकसभा में औसतन 6 घंटे काम होता है जबकि राज्य सभा में 5 घंटे काम होता है. इस प्रकार 4 दिन में 44 घंटे काम होना चाहिए जिसके सापेक्ष कार्य कुछ भी नहीं हुआ, कार्य होगा भी कैसे जब राज्यसभा 3 घंटे और लोकसभा में 1 घंटे के करीब कार्य चला इसके अतिरिक्त सिर्फ हंगामा ही हुआ, यह है देश के संचालको का मेहनतकश देश के प्रति समर्पित आस्तित्व. यह पहली बार नहीं हो रहा है जब जनता का पैसा संसद में इस प्रकार नष्ट किया गया बल्कि इससे पहले भी यह होता आया है बजट सत्र 2014 में लोकसभा प्रोडक्टिविटी 103% रही तो राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी 106% थी, शीतकालीन सत्र 2014 में लोकसभा 98% तथा राज्यसभा 58% प्रोडक्टिविटी रही. बजट सत्र २०१५ में लोकसभा 122% तो राज्यसभा में प्रोडक्टिविटी का स्तर 102% और मानसून सत्र 2015 लोकसभा 6% एवं राज्यसभा 12% प्रोडक्टिविटी पर स्थिर है.
संसद की यह स्थिति देश की जनता पर क्या प्रभाव डालती है और इसका असर वर्तमान सरकार पर क्या पड़ेगा यह दरकिनार करते हुए यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि क्या संसद में होने वाली यह प्रणाली उचित है देशहित में ? क्या इसका अच्छा सन्देश अन्य राष्ट्रों में जाता है ? इससे होने वाली आर्थिक क्षति जो जनता के माध्यम से प्राप्त होता है उसे इस प्रकार नष्ट किया जाना भारत की समृद्धि को किस दिशा की तरफ ले जा रही है ? विचारणीय है. जब देश का संचालक अर्थात मुखिया पर उसके ही अधीनस्थ ऊँगली उठाते हैं तो बाहरी देशों से किस प्रकार की मानवता चाहते हैं हम. आज भारत विश्व में प्रत्येक स्तर पर अपना सम्मानजनक कद खड़ा करने में सफलता की ओर अग्रसर है ऐसे में देश के प्रतिनिधित्व करने वाले नायक का सहयोग करने के स्थान पर आरोप प्रत्यारोप करते हुए राष्ट्र की जड़ को खोखला करने में भूमिका निभाने वाले किस प्रकार राष्ट्रहित में सहयोग कर रहे हैं ? विचारणीय है.



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
July 29, 2015

श्री कृष्ण कुमार जी संसद की गरिमा शोर गुल ने खत्म कर दी बहुत अच्छा विचारणीय प्रश्न उठाता प्रश्न

krishna kumar pandey के द्वारा
July 29, 2015

प्रणाम शोभा जी, आपका आभार सहित धन्यवाद और मै आपके विचारों से सहमत हू, जहा बच्चो जैसी मानसिकता के अधीन होकर मार पीट करने में नहीं चूकते यह उन्हें संसद और देश की गरिमा से क्या मतलब, जानता का पैसा है कब तक खायेंगे बहुत खा चुके अब जानता भी अपने दिए गए धन का हिसाब मांगेगी सरकार से आज नहीं तो कल यह अवश्य होगा.


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