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माँ तो ......... माँ होती है...

Posted On: 27 Nov, 2014 Others,मेट्रो लाइफ,social issues में

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हम सभी का आस्तित्व माँ से है, माँ न होती तो हम कहाँ होते और जब हम होते ही नहीं तो फिर कैसे माँ को जिसने हमें जन्म दिया उसे भूल जाते या फिर उसके साथ अमानवीय व्यवहार कर पाते. ऐसा ही कुछ आप आगे पढ़ेंगे. हैल्लो माँ ……. मै रवि बोल रहा हूँ ….कैसी हो माँ…….? मै …मै …ठीक हूँ बेटे….ये बताओ तुम और बहू दोनों कैसे हो ? हम दोनों ठीक है. माँ… आपकी बहुत याद आती है….अच्छा सुनो माँ, मै अगले महीने इंडिया आ रहा हूँ…..तुम्हे लेने. क्या….? हां माँ…… अब हम साथ ही रहेंगे…, नीतू कह रही थी माँ जी को अमेरिका ले आओ वहां अकेली बहुत परेशान हो रही होंगी. हैल्लो…. सुन रही माँ…? “हां….हां बेटे…” बूढ़ी आँखों से ख़ुशी की अश्रुधारा बह निकली, बेटे और बहू का प्यार नस नस में दौड़ने लगा. जीवन के सत्तर साल गुजार चुकी सावित्री ने जल्दी से अपने पल्लू से आंसू पोछे और बेटे से बात करने लगी. पूरे दो साल बाद बेटा घर आ रहा था. बूढ़ी सावित्री ने मोहल्ले भर में दौड़ दौड़ कर ये खबर सबको सुना दी. सभी खुश थे कि चलो बुढ़ापा चैन से बेटे और बहू के साथ गुजार जायेगा. अमेरिका से रवि अकेला ही आया था, उसने कहा कि माँ हमें जल्दी ही वापिस जाना है इसलिए जो भी रुपया पैसा किसी से लेना है वो लेकर रख लो और तब तक मै किसी प्रॉपर्टी डीलर से मकान बेचने कि बात कर लेता हूँ. “मकान….?”, माँ ने पूछा. हाँ माँ, अब ये मकान बेचना पड़ेगा वरना कौन इसकी देखभाल करेगा. हम सब तो अब अमेरिका में ही रहेंगे. बूढ़ी आँखों ने मकान के कोने कोने को ऐसे निहारा जैसे किसी अबोध बच्चे को सहला रही हो. आनन फानन और औने पौने दाम में रवि ने मकान बेच दिया. सावित्री देवी ने वो जरुरी सामान ले लिया जिस से उनको बहुत ज्यादा लगाव था. रवि टैक्सी मंगवा चुका था. एयरपोर्ट पहुंचकर रवि ने कहा “माँ तुम यहाँ बैठो मै अंदर जाकर सामान की जांच और बोर्डिंग और वीजा का काम निपटा लेता हूँ. “ठीक है बेटे”, सावित्री देवी वही पास की बेंच पैर बैठ गयी. काफी समय बीत चुका था. बाहर बैठी सावित्री देवी बार बार उस दरवाजे की तरफ देख रही थी जिसमे रवि गया था लेकिन अभी तक बाहर नहीं आया. शायद अंदर भीड़ होगी…., सोचकर बूढ़ी आँखे फिर से टकटकी लगाये देखने लगती. अँधेरा हो चुका था. एयरपोर्ट के बाहर गहमागहमी कम हो चुकी थी. “माँ जी…., किस से मिलना है?”, एक कर्मचारी ने वृद्धा से पूछा. “मेरा बेटा अंदर गया था…. टिकेट लेने, वो मुझे अमेरिका लेकर जा रहा है…..”सावित्री देवी ने घबराकर कहा. “लेकिन अंदर तो कोई पैसेंजर नहीं है, अमेरिका जाने वाली फ्लाइट तो दोपहर में ही चली गयी. क्या नाम था आपके बेटे का?”, कर्मचारी ने सवाल किया. “र…रवि….”, सावित्री के चेहरे पर चिंता की लकीरे उभर आई. कर्मचारी अंदर गया और कुछ देर बाद बाहर आकर बोला,”माँ जी…… आपका बेटा रवि तो अमेरिका जाने वाली फ्लाइट से कब का जा चुका…. “क्या….? वृद्धा की आँखों से आंसुओ का सैलाब फूट पड़ा. बूढ़ी माँ का रोम रोम काँप उठा. किसी तरह वापिस घर पहुंची जो अब बिक चुका था. रात में घर के बाहर चबूतरे पर ही सो गयी. सुबह हुई तो दयालु मकान मालिक ने एक कमरा रहने को दे दिया. पति की पेंशन से घर का किराया और खाने का काम चलने लगा. समय गुजरने लगा. एक दिन मकान मालिक ने वृद्धा से पूछा. “माँ जी…. क्यों नहीं आप अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ चली जाये, अब आपकी उम्र भी बहुत हो गयी. अकेली कब तक रह पाएंगी.” “हाँ, चली तो जाऊ, लेकिन कल को मेरा बेटा आया तो…? यहाँ फिर कौन उसका ख्याल रखेगा?”………



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
November 30, 2014

माँ तो माँ होती है… बस!

Coltin के द्वारा
July 12, 2016

I ca1;&82n7#t wear mascara anymore because I cry too much. I tried sticking cotton balls under my eyelids to soak up the tears, but then I looked like a boxer after a heavyweight match.


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