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krishna kumar pandey


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होली तो हो ली

Posted On: 26 Mar, 2016  
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Hindi Sahitya Others Others मस्ती मालगाड़ी में

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बड़बोले ओवैशी की मासूम सोच

Posted On: 19 Mar, 2016  
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Others Politics Religious में

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बदलाव- कुछ तो करना ही होगा

Posted On: 17 Mar, 2016  
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Junction Forum Others Others social issues में

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ओवैशी के जहरीले नाखून

Posted On: 15 Mar, 2016  
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Others Others social issues न्यूज़ बर्थ में

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थपथपाए पीठ कोई अच्छा लगता है

Posted On: 24 Sep, 2015  
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Contest Others social issues कविता में

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ब्राह्म्ण केवल जाति नहीं

Posted On: 20 Sep, 2015  
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Career Contest Hindi Sahitya Junction Forum में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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श्री कृष्ण कुमार जी आपका लेख हर पाठक द्वारा पठनीय बहुत अच्छा लेख हैं आपने चिंतक के समान अपने विचार रखे हैं यह पंक्तिया "फिर इन विकारों के स्वामी आप क्यूं बने हैं यह तो आपको कोई किराया नही देते और आपके द्वारा शरण देने के बाद यह अपनी शर्तो का पालन आपसे ही कराते हैं, क्या यहॉ आपका मस्तिष्क शून्य हो जाता है जो यह अन्तर नही कर पाता कि हमने जिसे शरण दिया वह हमारा शासक कैसे बन सकता है ? यही विचार शून्यता आपको गुलाम बना लेती है और आप समाज के शत्रु स्वयं बन जाते हैं, जैसे हमारे पूर्वजों द्वारा विदेशियों को शरण देने का प्रमाण पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी की जंजीर पहनाता गया किन्तु शरण देने वाले उससे मुक्त नही हो सके" आप अपनी यह पंक्तियाँ एक बार फिर पढियेगा कितनी अच्छी बात हैं उत्तम विचार

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीय शोभा जी, आपका आभार सहित धन्यवाद लेख को पसंद करने के लिए, यह वास्तविक विचार है जिन पर हमें सोचना चाहिए और समज को इस तरफ सोचने के लिए उनका ध्यान इंगित किया जाना चाहिए, अन्यथा राजनीति को खिलवाड़ समझने वाले हमारे घरों तक पहुच जायेंगे और हम विवश होकर मात्र उनकी दस्ता स्वीकार करने के अतिरिक्त और कुछ न कर सकेंगे, यह गंभीर विषय है इस पर संसद में भी चर्चा होनी चाहिए किन्तु चर्चा करे वहां तो स्थिति ऐसी है जैसे हमाम में सब नंगे. यह दुर्भाग्य है देश का कि हमारा संचालक एक अपराधिक प्रव्रत्ति का चुना जाता है क्या ऐसे ही स्वतंत्र राष्ट्र की कल्पना की थी वीर शहीद क्रांतिकारियों ने जैसा आज हम स्वयं अपने ही द्वारा विकसित कर रहे हैं. इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए चुनावी प्रक्रिया में बदलाव आवश्यक है तभी देश का विकास संभव होगा.

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

श्री कृष्ण कुमार जी चाणक्य का उदाहरण देकर आपने लेख की शुरुआत बहुत अच्छे विचारों से की आपने अंत में एक ऐसा प्रश्न उठाया है यह सबके मन में उठता है परन्तु उत्तर नहीं मिलता चुनाव उम्मीदवार में जेल में सजा काट रहे अपराधियों को टिकट मिलता है और विडम्बना यह है कि उसे भी हम जीत दिला देते हैं अपना वोट देकर, क्या यही जागरूकता है ? जो स्वयं अपराधी है और जेल में बन्द है वह कैैसी सुरक्षा आपको दे सकता है, क्या कभी विचार किया आपने ? क्यूं नही हम सुयोग्य शासक हेतु सही उम्मीदवार का चयन करते हैं, क्यूं पार्टी के नाम पर वोट खराब करते हैं, विचार कीजिये क्या यही जागरूकता है ? हमें बदलना होगा तभी होगा स्वच्छ भारत का निर्माण।यही प्रजातंत्र की विडम्बना है

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

आदरणीय अमित शाश्वत जी, आपका कथन सत्य है, पटेल जी का बहुत ही संक्षिप्त जीवन दर्शन यहाँ प्रस्तुत हो सका स्थानाभाव के कारण जबकि उनके विचार एवं आदर्श पटेल जी के बचपन से लेकर उनकी सद्गति तक सभी अनुकरणीय हैं जिसके संबंध में लोगो को प्रेरणा देना आवश्यक है आज के दूषित वातावरण राजनैतिक परिवेश में. आज का नेता स्वयं एवं अपनी आने वाली पीढियों के उद्धार के लिए सत्ता लोभ का शिकार हो रहा है, आज के नेताओ को देश एवं देश की जनता से लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं है और न ही देश के कल्याण हेतु कोई विचार कभी इनके मन में आ सकता है बस स्वयं की स्वार्थपूर्ति, सुख सुविधाओ की पूर्ति के साथ किसी प्रकार अथाह धन का संग्रह करना राजनीति का परिचय बन गया है. ऐसे प्रतिनिधि स्वयं को परिपोषित कर रहे हैं देश के जनमानस का विचार स्वप्न में भी नही सोचते. आपके सुविचारो के लिए आभार सहित धन्यवाद.

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

के द्वारा: Dr. D K Pandey Dr. D K Pandey

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

पाण्डेय जी मेरा व्यक्तिगत विचार है कि जो धार्य (अपना स्वभाव) है, वही किसी प्राणी का धर्म होता है । वृक्ष का धर्म फल देना, बिच्छू का डंक मारना, सांप का काटना, गाय का दूध देना, बैल का हल जोतकर सेवा करना, कुत्ते का हड्डी चबाकर उसी जीभ को मालिक के ऊपर फेर देना, केंकड़ों का एकदूसरे की टांग खींचकर नीचे गिरा देना, आदि इत्यादि सम्बंधित प्राणियों का धर्म है । यह धर्म सभी में प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहता है, और प्रकृति द्वारा ही उसके धर्म का क्रमिक समयबद्ध विकास अथवा ह्रास होता है । एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसमें एडाप्टेड धर्म धारण करने की क्षमता है क्योंकि उसके पास बुद्धि है । इस प्राणी ने बुद्धि का प्रयोग कर अपनी आवश्यकतानुसार विभिन्न धर्मों का ईज़ाद किया, परंतु इस चक्कर में अपना वास्तविक प्रकृति प्रदत्त धर्म वह भूल गया । वह धर्म जो वास्तव में उसका अपना स्वभाव था, और हर प्रकार से प्राणिजगत के संतुलन के अनुकूल था । परिणामस्वरूप उसके द्वारा गढ़े गए धर्म कालान्तर में एकदूसरे के साथ गड्डमड्ड होकर, आपस में ही संक्रमण का शिकार होकर, अपना स्वरूप खोते रहे । मनुष्य का अपना कोई स्वभाव धर्म नहीं रहा, अतएव आज उसमें एक साथ ही वृक्ष, गाय, साँप, बिच्छू, कुत्ते और केंकड़े आदि के गुण धर्म परिलक्षित हो रहे हैं । वह जो दिखता है, वह है नहीं, और जो है, वह दिखता नहीं । जो सिद्धांत वह बघारता है, उसका व्यवहार उस सिद्धांत के ठीक उलट होता है । हम और आप सभी उसी धार्मिकता के साथ जी रहे हैं ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: krishna kumar pandey krishna kumar pandey

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